रायपुर, 14 फरवरी।
अब देशभर के आंगनबाड़ी केंद्र बच्चों के लिए पहली पाठशाला बन चुके हैं। कभी केवल पोषण और देखभाल तक सीमित ये केंद्र आज प्रारंभिक बाल शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक जागरूकता और ग्रामीण रोजगार का समेकित केंद्र बन गए हैं।
छत्तीसगढ़ के महासमुंद, धमतरी, मुंगेली और नारायणपुर जिलों में यह बदलाव सबसे स्पष्ट दिखाई दे रहा है। महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) और महिला एवं बाल विकास विभाग की मदद से बनाए गए नए भवन बच्चों के लिए खेल-खेल में सीखने का माहौल तैयार कर रहे हैं। दीवारों, फर्श और सीढ़ियों पर अंक, वर्णमाला, आकृतियाँ, गणित और स्थानीय संस्कृति की चित्रकारी बच्चों की सीखने की जिज्ञासा बढ़ा रही है।
धमतरी जिले का बाला मॉडल इसका उदाहरण है। जिले में 81 बाला आधारित आंगनबाड़ी केंद्र बनाए गए, जिनमें से 51 केंद्र पूरी तरह से तैयार हैं। ग्राम उड़ेंना में बने केंद्र में विशेष पिछड़ी जनजाति के बच्चे दृश्य-आधारित शिक्षण के जरिए आसानी से सीख रहे हैं। दीवारों पर ज्ञान चार्ट, फर्श पर रंग-आकार और सीढ़ियों पर गिनती संरचना बच्चों की स्मरण शक्ति और सीखने की रुचि बढ़ा रही है।
ये केंद्र अब सिर्फ बच्चों तक सीमित नहीं हैं। गर्भवती महिलाएँ, धात्री माताएँ और किशोरी बालिकाएँ भी पोषण, टीकाकरण और स्वास्थ्य परीक्षण के लाभ ले रही हैं। प्रधानमंत्री मातृत्व वंदन योजना, सुकन्या समृद्धि योजना और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ आंगनबाड़ी केंद्रों के माध्यम से प्रभावी रूप से पहुंच रहा है।
मनरेगा के तहत भवन निर्माण से ग्रामीणों को स्थायी रोजगार मिला है, जिससे परिवारों की आय बढ़ी और पलायन पर भी नियंत्रण हुआ। रंग-बिरंगी दीवारें, खेल सामग्री और बच्चों की हँसी केंद्रों को आधुनिक प्ले-स्कूल जैसा माहौल दे रही हैं।
आरओ जल, स्वच्छ रसोई, खेलघर और नियमित सफाई से केंद्र सुरक्षित और बाल-अनुकूल बन चुके हैं। आंगनबाड़ी केंद्र अब बच्चों के सर्वांगीण विकास, महिलाओं के सशक्तिकरण और ग्रामीण रोजगार का राष्ट्रीय प्रेरक मॉडल बन गए हैं।



