मुंबई, 17 फरवरी।
रोशनी से भरे इस दौर में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो सिर्फ पर्दे पर नहीं, बल्कि दिलों में भी बस जाते हैं, और मृणाल ठाकुर उन्हीं में से एक हैं, जिनकी आंखों में सपनों की चमक और मुस्कान में संघर्ष की कहानी झलकती है। छोटे पर्दे की सादगी भरी शुरुआत से लेकर बड़े परदे की दमदार मौजूदगी तक, उनका हर कदम जुनून और आत्मविश्वास की मिसाल रहा है।
टीवी शो 'मुझसे कुछ कहती... ये खामोशियां' और 'कुमकुम भाग्य' से पहचान बनाने वाली मृणाल ने फिल्मों की दुनिया में कदम रखते ही संवेदनशील फिल्म 'लव सोनिया' से अभिनय की गहराई दिखाई। इसके बाद 'सुपर 30', 'बटला हाउस', 'तूफान' और 'जर्सी' में उनकी मौजूदगी ने साबित किया कि वह सिर्फ अभिनेत्री नहीं, बल्कि हर किरदार को जीने वाली कलाकार हैं। साउथ सिनेमा में 'सीता रामम' और 'हाय नन्ना' ने उन्हें पैन-इंडिया पहचान दिलाई। अब अपनी नई फिल्म 'दो दीवाने सहर में' के जरिए वह भावनाओं की नई दास्तां लेकर आ रही हैं, जो 20 फरवरी 2026 को रिलीज हो रही है। इस मौके पर उन्होंने 'हिन्दुस्थान समाचार' से अपने सफर, संघर्ष और सपनों पर खुलकर बात की।
सवाल : फिल्म के टाइटल में 'सहर' शब्द का क्या अर्थ है?
मृणाल ठाकुर: उन्होंने कहा, 'सहर' का मतलब होता है भोर, अंधेरे को चीरती हुई रोशनी की पहली किरण। इस शब्द में सादगी, देसीपन, उम्मीद और नई शुरुआत का भाव है। पुराने गीत 'दो दीवाने शहर में' की संवेदना को हमने अपने टाइटल में अपनाया है। संजय लीला भंसाली सर ने टाइटल का सुझाव दिया। फिल्म में शशांक 'श' का सही उच्चारण नहीं कर पाता और 'शहर' की जगह 'सहर' बोलता है, जो मासूमियत और प्रेम की शुरुआत का प्रतीक बन जाता है।
सवाल : करियर की शुरुआत में क्या आपको रास्ता अनिश्चित या जोखिम भरा लगा?
मृणाल ठाकुर: हाँ, बिल्कुल। बचपन से ही मेरे भीतर झिझक थी। अंग्रेज़ी को लेकर हीन भावना थी और नाम 'मृणाल' लड़कों जैसा लगता था, जिससे स्कूल में चिढ़ाया जाता था। फिल्म इंडस्ट्री में आने के बाद भी असुरक्षा रही। समय के साथ समझ आया कि असुरक्षाएँ तभी बड़ी बनती हैं, जब हम उन्हें खुद बड़ा बना देते हैं। अब मैं अपने व्यक्तित्व और जड़ों के साथ सहज और संतुष्ट हूँ। फिल्म 'दो दीवाने सहर में' में मेरा किरदार 'रोशनी' मेरे व्यक्तित्व का लगभग साठ प्रतिशत है। कहानी दो लोगों की कमियों को समझने, स्वीकारने और खूबसूरती में बदलने की है।
सवाल : ऑन-स्क्रीन केमिस्ट्री के पीछे ऑफ-स्क्रीन बॉन्डिंग कितनी अहम रही?
मृणाल ठाकुर: हमारा रिश्ता केवल को-एक्टर्स वाला नहीं, बल्कि दोस्ती में बदल गया। हम एक-दूसरे की परवाह करते हैं, हल्की-फुल्की नोकझोंक और मज़ाक-मस्ती भी होती है, लेकिन अंत में दिल से जुड़े रहते हैं। सेट पर उनकी सादगी और फोकस साफ नजर आता था। उनके साथ काम करना सौभाग्य से कम नहीं था। शूट के दौरान मुंबई के विभिन्न स्थानों पर फिल्माया गया क्लाइमेक्स मेरे लिए बेहद खास रहा। मुंबई मेरे लिए सिर्फ शहर नहीं, बल्कि घर जैसा एहसास है।
सवाल : हिंदी और साउथ फिल्म इंडस्ट्री में काम करने का अनुभव कैसा रहा?
मृणाल ठाकुर: सबसे बड़ा अंतर भाषा का है। मेहनत, प्रोफेशनलिज़्म और समर्पण दोनों इंडस्ट्री में समान हैं। संस्कृति और खान-पान अलग होते हैं, लेकिन काम के प्रति जुनून हर जगह एक जैसा है। शूटिंग का शेड्यूल टाइट और दबाव भरा होता है। एक फिल्म 38 दिन में पूरी हुई, जबकि 'डकैत' में 75 दिन और पहले की फिल्म में लगभग 120 दिन लगे। असली ताकत दर्शक हैं। हिंदी हो या साउथ, हर जगह से भरपूर प्यार मिला।
सवाल : क्या आपके 'लुक' को लेकर कोई अलग अनुभव रहा?
मृणाल ठाकुर: जी हाँ, 'लव सोनिया' के दौरान मेरा ऑडिशन एक फोल्डर में रखा गया था जिस पर लिखा था 'खोलना मना है।' निर्देशक तबरेज नूरानी ने फाइल खोली और मुझे मौका दिया। यह किरदार एक गांव की साधारण लड़की का था, इसलिए टीम को समझाना पड़ा कि सादगी वाला लुक मेकअप और तकनीक से हासिल किया जा सकता है। शोहरत के पीछे कई त्याग छिपे होते हैं और हर किसी का अपना संघर्ष होता है।




